1- देश के दायरे में बंधी न्याय भावना:
यदि आपकी न्याय भावना अपने देश के दायरे में बंधी है, तो आपकी सरकार या शासक वर्ग किसी दूसरे देश के साथ अन्याय करता है तो आप अपनी सरकार का समर्थन करेंगे, क्यों न वह अन्याय ही कर रही हो। जैसे यदि अमेरिका-ब्रिटेन या कोई अन्य देश फिलिस्तीनियों के नरसंहार में इजरायल का साथ दे रहा है, तो आप अपनी सरकार का विरोध नहीं करेंगे। यदि भारत, नेपाल, श्रीलंका या पाकिस्तान या कोई अन्य देश के साथ अन्याय कर रहा है, तो देश से बंधी न्याय भावना आप में यह संवेदना नहीं पैदा करेगी कि अन्याय तो अन्याय है, चाहे मेरा देश ही क्यों न कर रहा हो, और आपको न्याय के साथ खड़ा होना चाहिए।
यूरोप और अमेरिका में लाखों लोग सड़कों पर उतरकर पिछले दिनों अपने देश की सरकारों और शासक वर्ग की इजरायल परस्त नीतियों का विरोध किया। इसी तरह वियतनाम पर अमेरिकी हमले के दौरान अमेरिकी नागरिक सड़कों पर उतरे और अपने देश के हमले का विरोध किया और वियतनामी जनता के साथ खड़े हुए। यह देश से बंधी न्याय भावना के लोग नहीं कर सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने देश से प्रेम न करें, अपने देश से प्रेम करने का मतलब न्याय-अन्याय के विवेक को खो देना नहीं होता है।
2-धर्म से बंधी न्याय भावना-
यदि आपकी न्याय भावना आपके धर्म से बंधी हुई है, तो भी आपकी संवेदना न्यायिक नहीं हो पायेगी। आपके धर्म के लोग यदि दूसरे धर्मों के लोगों के साथ अन्याय करेंगे, तो आपको अन्याय नहीं लगेगा। यदि आपके धर्म के लोगों के साथ अन्याय होगा, तो आप उबल उठेंगे। क्या न्यायपूर्ण हैं और क्या अन्यायपूर्ण हैं, धर्म से बंधी न्याय भावना में यह विवेक नहीं होगा।
यदि कोई देश आपके धर्म के लोगों का है या सरकार आपके धर्म की है, तो आप उस देश के न्याय-अन्याय को विवेक से नहीं धर्म के चश्में से देखेंगे। न्यायिक विवेक और संवेदना होने के लिए धर्म से बंधी दृष्टि अंधा बना सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि आप का नास्तिक होना जरूरी है या अपने धर्म को छोड़ देना जरूरी है। बात सिर्फ इतनी है कि आपकी दृष्टि अपने धर्म से बंधी नहीं होनी चाहिए।
न्यूयार्क के मेयर ममदानी साफ कहते हैं कि उनकी आस्था मुस्लिम धर्म में है, लेकिन उनकी न्याय और अन्याय की दृष्टि उससे बंधी हुई नहीं। वह सबके लिए न्याय के पक्ष में खड़े हैं। ऐसे लाखों लोग दुनिया में हुए हैं। गांधी की हिंदू धर्म में खूब आस्था थी, लेकिन उनकी न्याय-अन्याय की दृष्टि हिंदू धर्म से बंधी नहीं थी। इसलिए गोडसे ने उनकी हत्या कर दी। वह चाहता था कि वे सिर्फ हिंदू की तरह ही देखें और सोचें।
एक बड़े उदाहरण डॉ. आंबेडकर हैं, उनकी आस्था बौद्ध धम्म में थी। लेकिन बौद्ध उनकी न्यायिक दृष्टि की सीमा नहीं थी। उन्होंने कहा कि बौद्ध में यदि कुछ भी बहुजनों (बहुसंख्यक जन) के कल्याण के खिलाफ दिखता है, तर्क और विवेक की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है, तो मैं उसे स्वीकार नहीं करता।
3- वर्ण-जाति से बंधी न्यायिक दृष्टि-
भारतीयों के न्यायिक विवेक को खत्म करने वाली सबसे बड़ी चीज उनकी वर्ण-जाति से बंधी न्यायिक दृष्टि है। भारत में ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं, जिनकी न्यायिक दृष्टि उनके वर्ण-जाति में न बंधी हो। सामान्य लोगों की बात ही छोड़ दीजिए। भारतीय इतिहास के महान से महान कहे जाने वाले लोगों की भी दृष्टि वर्ण-जाति से बंधी हुई थी। गांधी जैसा महान कहे जाने वाला व्यक्ति भी न्यायिक दृष्टि लंबे समय तक वर्ण- जाति ही नहीं, नस्लीय श्रेष्ठता (आर्य नस्ल) की श्रेष्ठता से बंधा हुआ था।
दक्षिण अफ्रीका में अपने 21 वर्षों के प्रवास काल में वे अफ्रीकी लोगों को दोयम दर्जे की नस्ल का मानते रहे। खुद को यूरोपीय गोरे आर्य नस्ल का मानते रहे। इसके आधार पर न्याय और अन्याय का पक्ष भी चुनते रहे। लंबे समय तक वर्ण-जाति आधारित श्रेष्ठता और निकृष्टता को मानते रहे। ब्राह्मणों का यूनिवर्स का फूल कहते रहे। खैर धीरे-धीरे ही सही नस्ल और जाति की न्यायिक विवेक से मुक्त हुआ, पर वर्ण को तो नहीं अस्वीकार कर पाए।
तिलक कि बात ही छोड़ दीजिए यहां तक कि विवेकानंद जैसे लोग भी अंतिम समय तक यह कहते रहे हैं कि कायस्थ एक महान जाति है, जिस जाति के वे थे।
फुले, पेरियार, आंबेडकर जैसे लोगों में जो इतना यूनिवर्सल न्यायिक दृष्टि दिखती है, इसका कारण यह था कि उनकी दृष्टि जरा भी वर्ण-जाति से नहीं बंधी थी। यही स्थिति भगत सिंह की भी कमोबेश थी। नेहरू की दृष्टि भी धर्म या वर्ण-जाति से बंधी नहीं थी, यहां तक कि देश से भी नहीं बंधी थी। उनका न्यायिक विवेक ज्यादा व्यापक था।
4- लैंगिक पोजीशन से बंधी न्यायिक दृष्टि-
यदि आप न्याय-अन्याय को पुरुष या स्त्री की पहचान के आधार पर देखते हैं, तो आपका न्यायिक चरित्र का हो पाना मुश्किल हैं। यदि आप लिंग के आधार पर स्त्री को दोयम दर्जे का या कमतर मानते हैं, उसे अधीनता में रहना चाहिए इसके हिमायती हैं, तो आप कभी भी न्यायिक दृष्टि का नहीं हो पाएंगे। इस मामले में भी भारतीयों की न्यायिक दृष्टि बहुत कमजोर है।
इस संदर्भ में लोहिया का यह कहना सौ प्रतिशत सही है कि भारतीयों का दिमाग जाति और योनि के कटघरे में कैद है। इस कैद में बंद भारतीय आदमी का न्यायिक चरित्र और न्यायिक संवेदना बहुत ही कमजोर होती है।
5- नस्ल से बंधी न्यायिक दृष्टि-
दुनिया की न्यायिक दृष्टि लंबे समय तक नस्ल के आधार पर बनी हुई थी, यहां तक कि दूसरे नस्ल के लोगों का पूर्ण खात्मा भी न्यायिक लगता था। जैसे यूरोप-अमेरिका ने लैटिन अमेरिका, आस्ट्रेलिया और अमेरिका (यूएसए) के मूल निवासियों का बर्बर तरीके से खात्मा कर दिया। लाखों नहीं करोड़ों की संख्या में उन्हें मार डाला गया।
भारतीय उपमहाद्वीप लंबे समय तक गोरे यूरोपीय-अमेरिकी (यूएस) नस्लवाद का शिकार रहा है, लेकिन भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा खुद भी नस्लीय श्रेष्ठता बोध से ग्रसित रहा है। ब्रिटिश उपनिवेशवादी भारत पर अपने औपनिवेशिक कब्जे और साम्राज्यवादी वर्चस्व को ‘गोरों का बोझ’ के रूप में परिभाषित करते रहे हैं। उन्हें लगता था कि वे भारत पर औपनिवेशिक शासन कायम करके ‘असभ्य’ भारतीयों को ‘सभ्य’ बना रहे हैं। रंग के आधार पर यूरोपीय गोरे प्रभु खुद को भारतीयों से श्रेष्ठ मानते रहे हैं और आज भी कई सारे मानते हैं।
यूरोपीय गोरों के नस्लीय श्रेष्ठता बोध के शिकार भारतीय भी खुद को श्रेष्ठ आर्य नस्ल का मानते हुए, अफ्रीकी लोगों को उनके रंग और शारीरिक बनावट के आधार पर नीचा मानते रहे हैं और आज भी उसकी यह सोच किसी न किसी स्तर पर कायम है। भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी जसप्रीत बुमराह और ऋषभ पंत ने ईडेन गार्डेन मैदान पर पहले टेस्ट मैच के दौरान दक्षिणी अफ्रीकी टीम के कप्तान टेम्बा बेवुमा को बौना कहना इसका एक हालिया प्रमाण बस है।
भारतीयों का यह नस्लीय श्रेष्ठता बोध कोई नई चीज नहीं है और यह सिर्फ अफ्रीकी मूल के ब्लैक लोगों तक सीमित नहीं है। हिंदी पट्टी के गेंहुए रंग के लोग खुद को दक्षिण भारत के और हिंदी पट्टी के भी काले रंग के लोगों की तुलना में श्रेष्ठ मानते रहे हैं और आज भी बहुत सारे मानते हैं। इसका एक नस्लीय आधार भी रहा है, हिंदी पट्टी के लोग खुद को आर्यावर्त के आर्य मानते हैं और दक्षिण भारत के काले रंग के लोगों को दोयम दर्जे की द्रविड़ नस्ल के रूप में देखते रहे हैं और आज भी देखते हैं। यह दृष्टि न्याय और अन्याय के विवेक को खत्म कर देती है।
हिंदी पट्टी और पश्चिमोत्तर भारत के भारतीयों का यह नस्लीय रवैया केवल दक्षिण भारत के लोगों तक सीमित नहीं है, इसका सबसे भद्दा रूप अपने ही देश के पूर्वोत्तर लोगों के मामलों में दिखता है। उनके नाक-नक्श और रूप-रंग के आधार पर उन्हें चीनी, नेपाली और न जाने क्या-क्या कहते रहे हैं और आज भी कहते हैं। ऐसा ही, और कई बार इससे भी बदतर स्थिति आदिवासियों के बारे में दिखाई देती है।
6-पार्टी-संगठन से बंधी न्यायिक दृष्टि-
यदि आप भाजपाई हैं, तो भाजपा का सब ठीक है। यदि आप कांग्रेसी हैं, तो कांग्रेस का सब कुछ ठीक है। यदि आप सपा या राजद के हैं, तो उनका सब कुछ ठीक है, यदि बसपा के हैं, उनका सब कुछ ठीक है, यदि आप वामपंथ के किसी ग्रुप या पार्टी के हैं, उनका सब कुछ ठीक है। मेरी पार्टी, मेरा नेता और मेरा संगठन और मेरा विचार पूरी तरह ठीक है। फिर आपकी न्याय-अन्याय की परिभाषा और विवेक सिर्फ पार्टी, नेता और संगठन के आधार पर तय होने लगता है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम किसी पार्टी में न हों, किसी पार्टी के समर्थक न हों, किसी विचार के समर्थक न हों, किसी नेता के समर्थक या पक्षधर न हों, लेकिन यह किस लिए न्यायिक विवेक को बड़ा करने के लिए या संकीर्ण या संकुचित करने के लिए। न्यायिक विवेक किसी पार्टी या नेता तक सीमित कर देना हमारे न्यायिक विवेक को खत्म कर देता है या बहुत ही सीमित कर देता है।
7- खुद को ही सही मानने से बंधी न्यायिक दृष्टि-
यह तो कई बार सबसे अधिक खतरनाक होता है कि हम खुद को सही मानते हैं, कभी-कभी तो यहां तक सोचने लगते हैं कि मैं जो सोचता हूं, वही सही है। मैं ही सही हूं। यह देश, धर्म, वर्ण-जाति, नस्ल, लिंग, पार्टी, नेता आदि से बंधी न्यायिक दृष्टि से भी ज्यादा खतरनाक होता है। उनमें तो कम से कम एक बहु संख्या होती है, व्यापकता होती है, इसमें तो एक व्यक्ति खुद को ब्रह्मंड का केंद्र मानने लगता है, इसका सबसे मूर्त रूप हिटलर था। वह वहां पहुंच गया था कि वह जो सोचता है, वही न्याय है।
अन्य बहुत सारे चीजें हैं, जो हमारी न्यायिक दृष्टि को बांध रखी हैं। हम एक देश के नागरिक हैं, किसी धर्म में हमारी आस्था है, किसी वर्ण-जाति में हम पैदा हुए हैं, हम स्त्री या पुरुष हैं, यह चुनाव हमारा व्यक्तिगत नहीं है, लेकिन हम सबसे पहले इंसान हैं, मानव जाति के हिस्से हैं, पूरी मनुष्य जाति हमारी है। हमारी सबसे पहली प्रतिबद्धता न्याय के प्रति होनी चाहिए, अन्याय के खिलाफ होनी चाहिए। हमें हर पल कोशिश करनी पड़ेगी कि हमारी न्यायिक दृष्टि व्यापक होती जाए, यह हर पल चलने वाला निरंतर संघर्ष है। बंधी हुई न्यायिक दृष्टि को तोड़ना हमारे सामने उपस्थित चुनौतियों में एक बड़ी चुनौती है।
(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)